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भारत का राष्ट्रीय खेल भले ही हॉकी है पर करोड़ों भारतीयों का पसंदीदा खेल क्रिकेट ही है। आज भी यदि क्रिकेट का रोमांचक मैच चल रहा हो, तो लोग ऑफिस से छुट्टी ले लेते हैं। क्रिकेट प्रेमी हर मुसीबत झेल लेते हैं,पर क्रिकेट देखना नहीं छोड़ते । भारत का एक राज्य बिहार ऐसा है जहाँ क्रिकेट तो खेला जाता है पर इंडियन क्रिकेट कॉउन्सिल असोसिएशन द्वारा क्रिकेटर चुने नहीं जाते, उन्हें क्रिकेट में चुनाव के लिए पड़ोसी राज्य झारखंड का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि बिहारियों को अपराधी और हेय दृष्टि से देखा जाता है। बिहारियों की इसी छवि को हटाने के लिए निर्देशक योगेंद्र सिंह ने  फ़िल्म किरकेट बनाई है।
 बिहार के क्रिकेटर और संसद कीर्ति आजाद चाहते हैं कि उनके राज्य से भी प्रतिभाशाली क्रिकेटर चुने जाएं और भारतीय टीम में अपनी जगह बनाये। परंतु बिहार के लोगों की धूमिल छवि उनके मीमांसा को रौन्ध देती है। तभी क्रिकेट का शौक रखने वाला मुनवा का पिता डाकिया मौर्या दरभंगा (बिहार) के सांसद कीर्ति आजाद के कार्यक्रम में जाता है और अपने बच्चे का सपना टूटता देख कीर्ति आजाद को बल्ले से मारता है। कीर्ति आजाद मुनवा के पिता के गलती पर उसे दंडित ना करके उसकी मनोदशा जानकर बिहार की कड़वी राजनीति की सच्चाई बताते हैं। इस घटना से कीर्ति आजाद को प्रेरणा मिलती है और वे झारखंड के विधायक काली मुंडा से सहयोग की आशा रखते हैं, परंतु मुंडा उसका फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं मुंडा के विश्वासघात से आहत स्वयं की क्रिकेट असोसिएशन कंपनी एबीसी का निर्माण करते हैं और पूरे बिहार से क्रिकेट के शौकीनों को बुलाते हैं इस काम में वह पुराने बिहार के होनहार खिलाड़ी विशाल तिवारी की मदद लेते हैं। विशाल अपने क्रिकेट कैरियर के तबाह हो जाने पर क्रिकेट की बेटिंग करता है साथ ही बुरे व्यसनों में लिप्त हो जाता है। कीर्ति आजाद के कहने पर वह अपने पुराने साथी रवि बम्पर, शाहबुद्दीन के साथ एक नई टीम की खोज करता है इसके लिए वह लोगों को दो लाख रुपये का प्रलोभन देकर अपनी टीम बनाता है। कीर्ति आजाद की क्रिकेट टीम को देख मुंडा षडयंत्र रचता है और उन्हें आगे आने का मौका नहीं देता। कीर्ति आजाद अपने सपने को बिखरता देख अपनी बात असोसिएशन में रखते हैं और मुंडा, आज़ाद की टीम को प्रीमियम लीग में वाइल्ड कार्ड एंट्री देकर उनकी टीम को चुनौती देता है। कीर्ति आजाद की किरकेट टीम अपने को कैसे साबित करेंगे यही फ़िल्म का ट्विस्ट है।
 फ़िल्म के निर्देशक योगेंद्र सिंह का निर्देशन बेहतरीन है। उन्होंने चुस्त पटकथा के साथ इस फ़िल्म को पेश किया है। इसमें जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव, सामाजिक कुरीतियों और बिहारी की गलतियों के साथ उनकी योग्यता का भी सर्वश्रेष्ठ आंकलन किया है। देश में व्याप्त दुर्भावनाओं को भी दूर करने का प्रयास फ़िल्म के माध्यम से किया गया है। इसमें व्याप्त संदेश फ़िल्म को उबाऊ नहीं बनाते वरन दर्शकों को बांधे रखते हैं।

गायत्री साहू

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