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मुंबई - कोविड-19 महामारी का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और अन्य देशों की तरह भारत भी इसका सामना कर रहा है। स्वास्थ्य और संबंधित बुनियादी ढांचे की पर्याप्त तैयारी कभी भी बेकार नहीं जाती है, क्योंकि उसका उपयोग हमेशा अन्य आपदाओं - फिर चाहे वे प्राकृतिक हों या मानव-प्रभावित, या भविष्य की किसी भी वैसी ही स्वास्थ्य संबंधी महामारी के दौरान किया जा सकता है। 170 साल पुराना प्रमुख भूवैज्ञानिक अनुसंधान संगठन, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) भी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए तैयार है। "अंतरराष्ट्रीय आपदा नियंत्रण दिवस" (इंटरनेशनल डे ऑफ कैलामिटी कंट्रोल) के अवसर पर, यहां प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को कम करने की दिशा में जीएसआई के कुछ प्रयासों पर रोशनी डाली गई है। 

भूकंप: जीएसआई ने भारतीय प्लेट की टेक्टोनिक हलचलों पर नजर रखने और भूकंप के जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान के लिए एक स्ट्रेन मैप विकसित करने के लिए देश भर में 30 स्थायी जीपीएस स्टेशन लगाए हैं। अध्ययन का पहला चरण बहुत जल्द पूरा होने वाला है। जीएसआई संभावित भूगर्भीय रूप से असुरक्षित भूकंपीय स्थलों का मूल्यांकन करने के लिए भूकंपीय माइक्रो-ज़ोन्स का निर्धारण और सक्रिय फाल्ट्स का विस्तृत अध्ययन भी करता है और 1: 25,000 पैमाने पर मानचित्र प्रकाशित करता है। संबंधित राज्‍य सरकारों को जानकारी के साथ, ये सभी अध्ययन सार्वजनिक रूप से जीएसआई पोर्टल पर उपलब्ध हैं।

भूस्खलन: भूस्खलन के लिए देश में नोडल एजेंसी के तौर पर जीएसआई ने दार्जिलिंग और नीलगिरि जिलों में प्रायोगिक क्षेत्रीय भूस्खलन प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (रीजनल लैंडस्लाइड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम - एलईडब्ल्यूएस) की शुरुआत की है। भूदृश्य, जलवायु और सामाजिक पहलुओं के क्षेत्र से जुड़े भारतीय और यूरोपीय शोधकर्ताओं के एक बड़े समूह के साथ काम करने के बाद, जीएसआई ने इस तकनीक का स्वदेशी रूप से विकास और एक जारी सहयोगपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम- लैंडस्लिप में प्रदर्शन किया है। एलईडब्ल्यूएस के अलावा, जीएसआई ने राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रण (नेशनल लैंडस्लाइड ससेप्टबिलिटी मैपिंग - एनएलएसएम) परियोजना के कुल लक्ष्य (3.57 लाख वर्ग किमी) का लगभग 85% भी पूरा कर लिया है। जीएसआई भारत के सभी भूस्खलन को लेकर संवेदनशील क्षेत्रों  (4.2 लाख वर्ग किमी को कवर करते हुए) के लिए भूस्खलन की आशंका वाले नक्शे और एक राष्ट्रीय भूस्खलन सूची तैयार कर रहा है। पहचाने गए और चयनित क्षेत्रों में अधिकाधिक भू-वैज्ञानिक सूचनाओं के साथ विस्तृत भूस्खलन जोखिम क्षेत्रीकरण कार्य हो रहे हैं, ताकि प्रासंगिक संरचनात्मक / गैर-संरचनात्मक भूस्खलन शमन उपायों के कार्यान्वयन को सरल-सुगम बनाया जा सके।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (जीएलओएफ): जीएसआई हिमालय क्षेत्र में आने वाली आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) की भविष्यवाणी भी करता है। झील के फटने का कारण ग्लेशियर का अचानक आगे बढ़ना या उसका हिलोरें मारना (सर्ज) भी हो सकता है। हिमालय में ग्लेशियर संभावित जलवायु परिवर्तन के कारण सिकुड़ रहे हैं। निरंतर घटाव के कारण हिमालय क्षेत्र में कई हिमनद झीलें बन रही हैं। ये हिमनद झीलें अक्सर हिमोढ़ों द्वारा अवरुद्ध हो जाती हैं। हिमनद झील में दरार और उसके परिणामस्वरूप झील फटने को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (जीएलओएफ) कहा जाता है, जिसके चलते भारी मात्रा में पानी और मलबे का निकास बहाव क्षेत्र में गंभीर नुकसान कर सकता है। हिमाचल प्रदेश में झील सूची का पहला संकलन 2007-2008 में चंद्रभागा बेसिन के लिए हुआ था, जिसमें 16 प्रो-ग्लेशियल लेक्स, 2 हिमोढ़ अवरुद्ध झीलें, 1 सर्क झील, 1 सुप्राग्लेशियल झील और 5 अन्य झीलें जीएलओएफ जोखिम वाली झीलों के तौर पर पहचानी गई थीं। 2012 के दौरान, हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले में गेपांग गाथ ग्लेशियर झील को लेकर अध्ययन

किया गया था और भविष्य में जीएलओएफ के खतरे को खत्म करने के लिए एक सुरक्षा दरार का सुझाव दिया गया था। रिमोट सेंसिंग और मल्टीस्पेक्ट्रल डेटा के आधार पर, हिमनदीय 925,533 और 486 हिमनद झीलों की पहचान क्रमशः जम्मू और कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्य में की गई है। इनमें से, क्रमशः 41,65 और 13 झीलों की पहचान कमजोर के रूप में की गई है। जीएसआई जीएलओएफ से जुड़े खतरों का आकलन करता है और जोखिम को कम करने वाली रणनीतियों के विकास के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को इनपुट्स देता है।

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