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मौलाना आज़ाद के संघर्ष और देशप्रेम का अनूठा चित्रण - वो जो था एक मसीहा मौलाना आज़ाद

बॉलीवुड में बायोपिक का चलन ज़ोरों पर है । नए पुराने कई फिल्मकार क्रांतिकारियों , खिलाड़ियों के जीवन संघर्षों को फिल्मी पर्दे पर लाकर उनकी प्रसिद्धि में चार चांद लगा रहे हैं ।
 मगर अफसोस इस बात का भी है कि कुछ नामचीन मेकर धन की लालच में गुंडे बदमाशों की बायोपिक बनाकर उनका महिमामंडन करने से भी नहीं चूक रहे हैं । ऐसे लोग अपनी विकृत मानसिकता के साथ युवाओं को भी जोड़ रहे हैं जो एक सभ्य समाज के लिए घातक सिद्ध हो रहा है ।
 भारत देश जब गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ा हुआ था तब इस धरती पर कई सपूतों ने जन्म लिया और आज़ादी के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए और अमर हो गए । उनकी कुर्बानी को हमेशा याद किया जाता रहेगा ।
  फ़िल्म ' वो जो था एक मसीहा मौलाना आज़ाद ' की कहानी में एक इतिहासकार कुछ विद्यार्थियों को मौलाना आज़ाद के मकबरे पर उनकी जीवनी सुनाते हैं । गुलामी के दौर में मक्का से एक मुस्लिम परिवार कोलकाता ( भारत ) आया । उस परिवार का  एक बच्चा मोहियउद्दीन अबुल कलाम तेज़ बुद्धि वाला प्रतिभावान था । दो वर्ष की उम्र में उनकी माँ चल बसी और जिन्हें बंगाल की धरती में दफनाया गया तभी से कलाम भारत की धरती को अपनी माँ मानने लगे । कलाम के पिता खैरुद्दीन अंग्रेजियत के सख्त खिलाफ थे । एक एक कर उनके परिवार के सदस्यों की मृत्यु हो गयी मगर उन्होंने हिम्मत नही हारी । कलाम अंग्रेज़ी शिक्षा ग्रहण कर अंग्रेज़ो से टक्कर लिए । क्रांतिकारी संगठन से जुड़कर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए । निर्भीक पत्रकार के रूप में कलाम ब्रिटिश सरकार की नज़रों को चुभने लगे तो उन्हें कोलकाता से निकालकर रांची में नजरबंद कर दिया गया । उनकी ख्याति महात्मा गांधी तक पहुंची । वे गांधी जी के साथ कांग्रेस से जुड़े जहाँ जवाहर नेहरू के करीब आये तो जिन्ना को खटकने लगे । जब देश आज़ाद हुआ तब मौलाना आज़ाद प्रथम शिक्षामंत्री नियुक्त हुए । उन्होंने तकनीकी रूप से भारत को मजबूत बनाया और फिर इस दुनिया को अलविदा कह गए ।
 मौलाना जीवनभर हिन्दू मुस्लिम एकता को प्राथमिकता दिए , विभाजन से वह बहुत आहत हुए ।
इस देश के प्रति मौलाना आज़ाद के कर्तव्यों की अनूठी सच्चाई को फ़िल्म के माध्यम से समाज तक लाने के लिए लेखक , कलाकार , निर्देशक डॉ. राजेन्द्र गुप्ता ' संजय ' ने गहरा शोध किया और एक बड़ी किताब भी लिख डाली ।
 उन्होंने अपनी बैनर राजेन्द्र फिल्म्स के अंतर्गत मौलाना आजाद की बायोपिक बनानी चाही तब श्रीमती भारती व्यास ने उनका हर कदम साथ निभाया । फिर तकनीकी रूप से युवा निर्देशक संजय सिंह नेगी उनसे जुड़े और हर चुनौती का सामना करते हुए हिंदी फिल्म ' वो जो था एक मसीहा मौलाना आज़ाद ' का निर्माण हुआ और अब दर्शकों के समक्ष बड़े पर्दे पर प्रदर्शित हुआ है ।
 फ़िल्म में निर्देशन चुस्त नज़र आता है । एक महापुरुष के पूरे जीवन का चित्रण मात्र दो घंटे में दिखा पाना बड़ा मुश्किल था फिर भी इस चैलेंज को स्वीकार कर फिल्ममेकर ने अपने अनुभव दर्शक तक रख पाने कामयाबी हासिल की है ।
 एक सत्यप्रेरक फ़िल्म में मनोरंजन के साथ प्रोडक्शन के हिसाब से कुछ कमियाँ झलकती है जिसे दर्शकों को नज़रअंदाज़ करना होगा । फ़िल्म में कई क्रांतिकारी महापुरुषों के कार्यों का जिक्र हुआ है जिसे देखकर नई पीढ़ी उनके आदर्शों से शिक्षा प्राप्त कर सकती है ।
 मौलाना आज़ाद की भूमिका को रंगकर्मी अभिनेता लिनेश फणसे ने साकार कर दिया है । हर फ्रेम में उन्होंने आज़ाद के चरित्र को जीवंत कर दिखाया है । फ़िल्म देखकर ऐसा लगता है मानो उनके भीतर मौलाना की आत्मा समा गई है । अन्य कलाकार सिराली , आरती गुप्ते , सुधीर जोगलेकर , शरद शाह , अरविंद वकारिया , सुनील बलवंत , मार्मिक गुप्ता , पवन मिश्रा , माही सिंह , मुन्ना शर्मा , चांद मिश्रा , चेतन ठक्कर , जमाल खान के टी मेघनानी और वीरेंद्र मिश्रा अपनी भूमिकाओं में जमे हैं ।
इतिहास के दृष्टिकोण से यह फ़िल्म कालजयी साबित होगी ।

- संतोष साहू

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