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पालघर। फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर नालासोपारा पश्चिम में तथागत बुद्ध स्तूप पर सैकड़ों की संख्या में बहुजन सुधारवादी संघ (बीएसएस BSS) संस्था के लोग दर्शन के लिए पहुंचे। दर्शन के लिए पहुंचे समाजसेवक डॉ सी आर सरोज ने जानकारी देते हुए बताया कि नालासोपारा स्थित बुद्ध स्तूप ढाई हजार वर्ष पुराना है यहां पर भगवान तथागत स्वयं आये थे, उस समय नालासोपारा बन्दरगाह होने के कारण यह एक व्यापारिक स्थान था। यहां पर बाबासाहेब अम्बेडकर भी आते थे दर्शन के लिए जिस पेड़ की छांव में बैठते थे वह आम का पेड़ आज भी मौजूद है।
BSS संस्था के लोगों ने उत्तर प्रदेश से अपने अध्यक्ष देवेंद्र यादव को भी बुलाया था। संस्था एक मिशन चला रहा है जो भारत के 85% लोग शुद्र हैं उनके हक अधिकार के लिए उन्हें जगाने का कार्य कर रहा है।
देवेंद्र यादव ने सबसे पहले बुद्ध वंदना, और संविधान शपथ दिलाने के बाद अपने वक्तव्य में कहा कि देश में मात्र दो मॉडल का तंत्र काम कर रहा है।
 देवेंद्र यादव ने बताया धर्मतन्त्र का जो मॉडल है उसका अपना 'भगवा' झण्डा है, 'मनुस्मृति' उसका संविधान है, 'मठ, मन्दिर, आश्रम' उसके संविधान की प्रशासनिक संस्थाएं हैं।
 'ईश्वर' इस मॉडल का खूँटा है, जिसके साथ 'आस्था' रूपी रस्सी से जनता को बांध दिया जाता है। 'असत्य' इसका 'दर्शन' है। 'विषमता' इसकी 'विचारधारा' है। 'जन्म आधारित पितृसत्तात्मक चातुरवर्णीय' इसका 'प्रबंधन' है। 'भक्ति' इसका मार्ग है। इस तरह धर्मतंत्र के अनुसार '15% सवर्ण' (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) मालिक हैं तो '85% शूद्र'(obc/sc/st/mino.) उसके गुलाम हैं। 
 देवेंद्र यादव ने कहा कि धर्मतंत्र को ब्राह्मणों ने इस तरह परिभाषित किया है कि विषमता परतंत्रता शत्रुता अन्याय के अनैतिक सिद्धांतों को अपना कर ब्राह्मणों ने, ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के लिए बनाई गई यह जन्म आधारित पितृसत्तात्मक चातुरवर्णीय विषमतावादी व्यवस्था है।" अर्थात ब्राह्मण के हाथ में धर्मतन्त्र की कमान बाकि सबका शोषण और सबका अपमान ! 
ब्राह्मण अपने इस विषमता के मॉडल को सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के नाम से प्रचारित करता है तथा इसे ईश्वर द्वारा रचित व्यवस्था बताकर और धार्मिक आस्था का वास्ता देकर अपने नेतृत्व में समाज को संगठित रखता है। ऐसे में ईश्वरीय आस्था से बंधे हुए लोग धर्मतन्त्र की प्रशासनिक संस्थाऐं मठ, मन्दिर, आश्रम की तरफ बिन बुलाए नाक रगड़ते हुए पहुँच जाते हैं, फिर वहाँ इन संस्थाओं के मालिक ब्राह्मण के चरणों में जाकर गिर जाते हैं। ऐसे गिरे हुए लोगों को ब्राह्मण हिन्दू कहता है और उन पर मनुस्मृति के नियमों को थोप देता है, अब यह कहने की जरूरत नही है कि धर्मतन्त्र की व्यवस्था में ब्राह्मण श्रेष्ठ है और बाकी सारे नीच, यह एक प्रशासनिक व्यवस्था है जो भी इस व्यवस्था की आस्था मान्यता परम्परा संस्कार त्योहार व्रत आदि से अपना सम्बन्ध रखेगा उसका वर्ण/जाति स्वभाविक तौर पर अपने आप तय हो जाता है अब आप लाख कोशिश कर लीजिए, भले ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का फायदा उठाकर CM, PM बन जाइए लेकिन धर्मतन्त्र की व्यवस्था में आप नीच ही माने जायेंगे। उन्होंने भूतपूर्व मुख्यमंत्री का उदाहरण दिया अखिलेश यादव के घर का शुद्धिकरण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
धर्मतन्त्र का यह षड्यंत्र इतना बारीक है जो आम शूद्रों को समझ नही आता है यदि शूद्रों में से कुछ मुठ्ठीभर शूद्रों को समझ भी आ जाता है तो ये मनुवादी ब्राह्मण इन्हें नास्तिक, कम्युनिष्ट, अर्बन नक्सल, अम्बेडकरवादी, खालिस्तानी, पाकिस्तानी समर्थक, हिन्दू धर्म विरोधी आदि बताकर पहचान देकर अपने ही शूद्र भाइयों से अलग थलग कर देते हैं तथा अन्य धर्मों का डर दिखाकर जाति में बंटे हुए ना समझ बहुसंख्यक शूद्रों को अपने धार्मिक आस्था के दायरे में संघठित रखकर उनका निरन्तर नेतृत्व करते हैं।
 लोकतंत्र का जो दूसरा मॉडल है इसका भी अपना 'तिरंगा' झण्डा है, 'भारत का संविधान' इसका संविधान है, 'राष्ट्रपति, संसद, सरकारी विभाग' इसके संविधान की प्रशासनिक संस्थाएं हैं। 
 'उत्तरदायित्व' लोकतंत्र का खूँटा है जिस पर सवाल उठाना जनता का 'अधिकार' है। 'समता' इसकी 'विचारधारा' है, 'सत्य' इसका 'दर्शन' है। 'ध्यान' इसका 'मार्ग' है। 'कर्म आधारित चतुरवर्गीय' इसका 'प्रबंधन' है। अर्थात हम अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर अपने वर्ग को बदल सकते हैं। लोकतांत्रिक कानून की नजर में हम केवल भारतीय है तथा धर्म हमारी निजी प्रेक्टिस है। जनता लोकतंत्र की ताकत है जो इसे अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण में रखती है जनता के सारे हित इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ जुड़े हुए हैं, इसलिए इसकी रक्षा करना जनता का नैतिक दायित्व है।
लोकतंत्र को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है कि समता स्वतंत्रता बन्धुता न्याय के नैतिक सिद्धान्तों को अपना कर लोगों ने, लोगों द्वारा, लोगों के लिए बनाई गई यह कर्म आधारित समतावादी चतुरवर्गीय व्यवस्था है। अर्थात जनता के हाथ में लोकतंत्र की कमान सबको अवसर और सबको सम्मान देता है।
 धर्मतन्त्र और लोकतंत्र आज देश की जनता के पास दो मॉडल है, धर्मतन्त्र देश की जनता को मन्दिर की तरफ ले जाता है तो लोकतंत्र स्कूल की तरफ। ये दोनों तंत्र एक दूसरे के दुश्मन है, इनमें से आज नही तो कल एक की मौत निश्चित है। ऐसे में यदि धर्मतन्त्र की मौत और लोकतंत्र की जीत हो जाती है तो 85% बहुजन शूद्र को सम्मान और स्कूल का कलम मिलेगा, इसके विपरीत यदि लोकतन्त्र की मौत और धर्मतन्त्र की जीत हो जाती है तो 85% बहुजन शूद्र को मिलेगा अपमान और मन्दिर का घण्टा। अब निर्णय 85% बहुजन शूद्र (obc/sc/st) को करना है उन्हें सम्मान और स्कूल की कलम चाहिए या अपमान और मन्दिर का घण्टा ?
उपरोक्त लोकतांत्रिक बिंदुओं को जब लोकतन्त्र के समर्थक अपने सामाजिक जीवन में व्यवहारिक तौर पर अपनायेंगे तब समाज का लोकतांत्रिक चरित्र निर्माण होगा। जब समाज का लोकतांत्रिक चरित्र निर्माण होगा तब संविधान की किताब पर छपा हुआ लोकतांत्रिक चरित्र व्यवहारिक रूप लेकर सही मायने में देश में लोकतन्त्र को स्थापित करेगा। अर्थात यदि हमें धर्मतन्त्र के बजाय लोकतन्त्र को स्थापित करना है तो हमें अपना धार्मिक चरित्र बदलकर लोकतांत्रिक चरित्र बनाना होगा। देवेंद्र यादव ने बखूबी विश्लेषण करके लोगो को समझाया उसके बाद अन्य लोगों ने भी अपने विचार दिए।
उत्तर प्रदेश से रामचंद्र यादव, ओपी बैरवा, नरेश जाधव, सिद्धार्थ बर्वे, भगवान काम्बले, डॉ. सी.आर. सरोज, कुसुम निसाद, सधीर कुमार, रामसागर, फूला ताई जाधव, रमेश गौतम ने सभा का संचालन किया। इस अवसर पर दीनानाथ मौर्या, संगीता मौर्या, अशोक निषाद, डॉ. रमेश यादव, अमित यादव, रेलवे अधिकारी मीना, चन्द्रभान पाल, शिवजी पाल, जयकुमार, रवि प्रजापति, वाल्के सर आदि मुख्य लोग उपस्थित थे।

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