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आयुष फिल्म्स इंटरनेशनल की प्रस्तुति निर्माता किशोर सावलानी और निर्देशक जाबिर अली की फ़िल्म 'लाफ्टर के चैप्टर' में एक नए प्रयोग के साथ रील और रियल खलनायकों की कॉमेडी को परोसा गया है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि एक फ़िल्म निर्माता को लेखक अपनी काल्पनिक कहानी सुनाता है जिसमें रियल खलनायक दाऊद, वीरप्पन और रियल खलनायक गब्बरसिंह, डाकू गुज्जर पर मंदी की जबरदस्त मार पड़ी है और उनकी हालत खस्ता हो गयी है। ऊपर से पुलिस को भी उनकी तलाश है। उन सभी को सूचना मिलती है कि एक बंगले में हीरे रखे हुए हैं फिर वे सभी एक के बाद एक चोरी की नीयत से उस बंगले में पहुँचते हैं जहां उनका एक भूतनी मधुबाला से सामना होता है। फिर सबको पता चलता है कि वह भूतनी एक आम इंसान फूलनदेवी है जिसके साथ विक्रम मल्ला नाम का एक प्रेमी भी है। फूलन और विक्रम चारों को बताते हैं कि वे भी हीरे की तलाश में इस बंगले में आये हैं और जब हीरा मिलता है तब पुलिस आ जाती है। फिर पता चलता है कि फूलन और विक्रम खुफिया पुलिस अधिकारी हैं। इन खतरनाक अपराधियों को पकड़ने में पुलिस कामयाब तो हो जाती है मगर चारों अपराधियों की सच्चाई का खुलासा होने पर पुलिस अपना सिर धुन लेती है। आखिर पुलिस के चंगुल में आये चारों मुज़रिम कौन होते हैं ? यह जानने के लिए दर्शकों को एक बार फ़िल्म देखना पड़ेगा।
फ़िल्म का कांसेप्ट बहुत बढ़िया है लेकिन निर्देशक उसे रोचक बनाने से चूक गए। फ़िल्म का छायांकन ठीक ठाक है।
फ़िल्म में आर्यन सिंह, सबीहा पिरानी, मुश्ताक़ खान, राजू श्रेष्ठ, बीरबल, नरेंद्र बेदी, अशफ़ाक अली, के टी आनंद राव, तैय्यब मलिक, सरिम राजूपत ने अभिनय किया है मगर फ़िल्म में उनकी कॉमेडी प्रभाव पैदा करने सक्षम नहीं हो सकी।

संतोष साहू

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