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चारा घोटाले को लेकर बिहार के विभिन्न कोषागारों से अवैध रूप से धन निकासी को लेकर अभी और भी फैसले आने बाकी हैं। करीब नौ सौ करोड़ रुपए के चारा घोटाले में देवघर कोषागार से करीब नब्बे लाख रुपए की अवैध निकासी के मामले में आखिरकार लालू प्रसाद यादव सहित सोलह लोगों के खिलाफ सीबीआइ अदालत ने फैसला सुना दिया। इसमें लालू यादव को साढ़े तीन साल की कैद और पांच लाख रुपए का जुर्माना मुकर्रर किया गया है। जबकि इस घोटाले से संबंधित बिहार के विभिन्न कोषागारों से अवैध रूप से धन निकासी को लेकर अभी फैसले आने बाकी हैं। लालू प्रसाद यादव को चार साल पहले भी चाईबासा कोषागार से अवैध धन निकासी का दोषी ठहराते हुए अदालत ने पांच साल कैद की सजा और पचीस लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसमें दो महीने जेल में रहने के बाद उन्हें सर्वोेच्च न्यायालय से जमानत मिल गई थी। इस बार भी चूंकि सजा तीन साल से ऊपर है, लालू यादव को ऊपरी अदालत में जमानत की अर्जी लगानी पड़ेगी। हालांकि इस पूरे मामले में राजनीतक षडयंत्र की पूरी बू आ रही है। क्योंकि अब तक देखा गया है कि मौजूदा सत्ताधारी अपना बदला लेने के लिए पिछले सत्ताधारी या विपक्ष पर आरोप तय कर उन्हें सलाखों के पीछे भेजते रहे हैं। महाराष्ट्र में पूर्व गृहमंत्री छगन भुजबल की हालत इस बात का सबूत है। 
अदालत के ताजा फैसले के बाद भी लालू यादव के तेवर में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा, वे सत्तापक्ष पर अपने खिलाफ साजिश का आरोप लगा रहे हैं। पर इस फैसले से एक बार फिर लोगों का जांच एजेंसियों और न्याय-व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा है। यह संदेश गया है कि दोषी चाहे कितना भी रसूखदार क्यों न हो, वह कानून के दायरे से बाहर नहीं है।
कुछ लोगों का मानना है कि इस सजा के बाद लालू यादव का बिहार की राजनीति से दबदबा खत्म हो जाएगा। मगर ऐसा दावा करना मुश्किल है। लालू के जेल में रहने के बाद भी उनकी पार्टी का नेतृत्व कमजोर होता नजर नहीं आ रहा। पिछली बार जेल की सजा मिलने के बाद वे संसद की सदस्यता और चुनाव लड़ने के अधिकार से हाथ जरूर धो बैठे, पर उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में पूरे दम-खम के साथ शानदार विजय हासिल की थी। आज भी बिहार विधानसभा में सबसे अधिक उन्हीं की पार्टी के सदस्य हैं। जब महागठबंधन टूटा और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर सरकार बना ली, तब भी न तो उनकी पार्टी में किसी तरह की टूट-फूट हुई और न अब अदालती फैसले के बाद उसके सदस्यों में कोई मोहभंग नजर आ रहा है। लालू के बेटे के नेतृत्व पर पार्टी सदस्यों और विधायकों का पूरा भरोसा है। इसलिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इससे लालू का प्रभाव कम हो जाएगा और राष्ट्रीय जनता दल की कमर टूट जाएगी।
इस फैसले से फिर यह धारणा टूटी है कि रसूखदार लोग कानून के चंगुल से बहुत आसानी से बच निकलते हैं। छिपी बात नहीं है कि चारा घोटाले में लालू यादव ने षड्यंत्रकारियों को बचाने और साक्ष्यों को मिटाने का भरपूर प्रयास किया। मुख्यमंत्री रहते उन्होंने इस मामले से जुड़ी तमाम फाइलें अपने पास रखीं और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करते हुए अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया। पर सीबीआइ जांच में उनका दोष छिपा न रह सका। अब वे जिस तरह सत्ता पक्ष पर साजिशन फंसाने और शिकंजा कसने का आरोप लगा रहे हैं, उससे लोगों का ध्यान स्वाभाविक रूप से सत्ता पक्ष की तरफ जा रहा है। ऐसा इसलिए भी है कि सत्ता पक्ष हमेशा से जांच एजेंसियों के कामकाज को प्रभावित करता देखा गया है। इसलिए नीतीश कुमार की गठबंधन सरकार पर लालू यादव सीधे निशाना साध पा रहे हैं। ऐसे में जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने की जरूरत फिर रेखांकित हो रही है।

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