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मुंबई। जैन धर्म की गौरवशाली शास्त्रीय परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और भारतीय ज्ञान-संपदा को समर्पित दो महान ग्रंथों ‘श्री सन्मति तर्क’ एवं ‘श्री सिद्धहेमचन्द्र शब्दानुशासनम्’ का भव्य विमोचन समारोह मुंबई के प्रार्थना समाज स्थित श्री चंद्रप्रभ स्वामी जैन देरासर संघ में श्रद्धा, भक्ति एवं गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद मिलिंद देवरा तथा श्री वर्धमान श्रुतगंगा के अध्यक्ष एवं ट्रस्टी डॉ. संजय जीवनलाल शाह सहित समाज के विशिष्ट महानुभावों एवं गणमान्य श्रावक-श्राविकाओं के करकमलों से इन महान ग्रंथों का विमोचन संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुनि प्रवर महाविमल विजयजी महाराज, मुनिराज पुण्य विजयजी तथा साध्वी तत्वदर्शनाश्रीजी सहित अनेक साधु-साध्वी भगवंतों की पावन उपस्थिति रही। आचार्य भगवंतों के सान्निध्य ने समारोह को आध्यात्मिक गरिमा एवं विशेष महत्व प्रदान किया। अपने संबोधन में श्री वर्धमान श्रुतगंगा के अध्यक्ष एवं ट्रस्टी डॉ. संजय जीवनलाल शाह ने शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक ज्ञान-संपदा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जैन आचार्य भगवंतों की तपस्या, साधना और विद्वत्ता से प्राप्त महान साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य मार्गदर्शन है। ऐसी ज्ञान-परंपरा को सुरक्षित रखना और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है। समारोह में श्री जैन धार्मिक शिक्षण संघ के उपाध्यक्ष-ट्रस्टी डॉ. संजय जीवनलाल शाह तथा जैन अल्पसंख्यक सेवा संस्थान की महिला विभाग की अध्यक्ष डॉ. अल्पा संजय शाह सहित ट्रस्टियों द्वारा श्रद्धालुओं एवं सहयोगियों का बहुमान किया गया। वहीं श्री चंद्रप्रभ स्वामी जैन देरासर संघ के ट्रस्टियों द्वारा भी भाविकों एवं सहयोगियों का सम्मान किया गया। यह आयोजन जैन धर्म की प्राचीन ज्ञान परंपरा, आचार्य भगवंतों की तपस्या, विद्वत्ता और भारतीय शास्त्रीय साहित्य के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया। गौरतलब हो कि शासन सम्राट, तपागच्छाधिपति एवं अनेक राजाओं-महाराजाओं को प्रतिबोध देने वाले परम पूज्य आचार्य भगवंत श्री विजय नेमिसूरीश्वर द्वारा रचित महान दार्शनिक ग्रंथ ‘श्री सन्मति तर्क’ के प्रकाशन एवं विमोचन को लेकर जैन समाज में विशेष उत्साह रहा है। आचार्य भगवंतों की पावन निश्रा एवं समुदाय के गुरु भगवंतों के मार्गदर्शन में आषाढ़ वद-सातम, दिनांक 1 नवंबर 2025 को देशभर के लगभग 60 स्थानों पर इस महान ग्रंथ के विमोचन समारोह आयोजित किए गए थे। ‘श्री सन्मति तर्क’ जैन दर्शन, न्याय, तर्कशास्त्र और दार्शनिक चिंतन का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इस महान कृति का संपादन पंडितप्रवर, शास्त्रनिष्ठ पन्यास श्री त्रैलोक्य मंडन विजयजी ने छह भागों में अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ढंग से किया है। यह ग्रंथ जैन दर्शन की तार्किक एवं दार्शनिक परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। इसी प्रकार संस्कृत व्याकरण एवं भाषाशास्त्र की गौरवशाली परंपरा को समर्पित ‘श्री सिद्धहेमचन्द्र शब्दानुशासनम्’ भारतीय साहित्य की एक विशिष्ट एवं महान कृति है। इस महान ग्रंथ पर न्यास की रचना साहित्य सम्राट, व्याकरण विशारद एवं वाकस्पति आचार्य श्री विजय लावण्य सूरीश्वरजी ने की है। इस विशिष्ट ग्रंथ के प्रेरणास्रोत एवं मार्गदर्शक सम्प्रदाय सम्राट आचार्य श्री विजय प्रभाकर सूरीश्वरजी हैं, जबकि इसका संपादन विद्वान आचार्य श्री विजय श्रीचन्द्र सूरीश्वरजी ने किया है। इस ग्रंथ के सातवें अध्याय के दो भागों का भी समारोह में विमोचन किया गया। इस प्रकार ‘श्री सन्मति तर्क’ के छह भागों तथा ‘श्री सिद्धहेमचन्द्र शब्दानुशासनम्’ के सातवें अध्याय के दो भागों का लोकार्पण विद्वानों, व्रतधारी श्रावक-श्राविकाओं एवं समाज के अग्रणी महानुभावों के शुभ हाथों संपन्न हुआ। 
इस अवसर पर लोकप्रिय युवा नेता एवं सांसद मिलिंद देवड़ा, संजयभाई शाह, कांतिलाल शाह (आनशा), अमितभाई झवेरी, मुकेशभाई दोशी, सुरेंद्रभाई छेदा, मुकुंदभाई शाह, मदनलाल मुठलिया, अध्यक्ष डॉ. अल्पा संजय शाह उपस्थित रहे।
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