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मुंबई। नानावटी मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, मुंबई के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ और गंभीर ऑक्युलर ट्रॉमा (आंख की चोट) के मामले में सफलतापूर्वक इलाज किया है। इससे 44-वर्षीय व्यक्ति की आंख बचाने में मदद मिली है। काम के दौरान एक दुर्घटना के कारण एयरपोर्ट पर काम करने वाले सचिन निकम की बायीं आंख में उन्हीं के चश्मे के टूटे हुए दो बड़े टुकड़े घुस गए थे।

एयरपोर्ट पर बैगेज ट्रांसफर करते समय लगेज बेल्ट की पट्टी अचानक उछलकर सचिन के चेहरे पर लग गई। इससे उनका चश्मा टूट गया और उसके टुकड़े उनकी पलक और बायीं आंख में चुभ गए। दुर्घटना के तुरंत बाद उन्हें इमरजेंसी डिपार्टमेंट में लाया गया। उस समय उन्हें बहुत ज्यादा दर्द था। साथ ही खून बह रहा था और जी मिचलाने की समस्या हो रही थी।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इमरजेंसी डिपार्टमेंट की टीम ने तुरंत आकलन किया और मरीज को स्टेबलाइज किया। आंख की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम तुरंत उठाए गए और मेडिकल मैनेजमेंट शुरू कर दिया गया। इसके बाद बिना देरी के स्पेशलिस्ट ऑफ्थेल्मोलॉजी सपोर्ट दिया गया।

जांच में डॉक्टरों ने पाया कि उनकी आंख और आसपास के हिस्से को बहुत नुकसान पहुंचा था। चोट से पलक दो जगहों पर कट गई थी और कॉर्निया में गहरा घाव हो गया था। इससे पारदर्शी कॉर्निया और आंख के बाहरी सफेद हिस्से पर प्रभाव पड़ा था। आंख के अंदर विट्रियस जेल और यूवील टिश्यू से संबंधित गंभीर नुकसान भी हुए थे। चोट की गंभीरता के कारण आंख का प्राकृतिक लेंस पहचानना ही मुश्किल हो गया था।

इमरजेंसी टीम ने तुरंत घाव का इलाज शुरू किया, एंटीबायोटिक्स दीं, आंख की सुरक्षा सुनिश्चित की, ऑपरेशन से पहले की जरूरी जांचें कीं और तुरंत मरीज को ऑपरेशन थिएटर में पहुंचाया। वहां पहुंचने के कुछ ही मिनट के भीतर नानावटी मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के कंसल्टेंट – ऑफ्थेल्मोलॉजिस्ट, डॉ. जिमित चौधरी और उनकी टीम के नेतृत्व में इमरजेंसी सर्जरी के लिए मरीज को तैयार किया गया।

सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने आंख में फंसे हुए कांच के टुकड़े निकाले और क्षतिग्रस्त आंख एवं पलक को रीकंस्ट्रक्ट किया। घाव को रिपेयर करने के लिए 30 से ज्यादा टांके लगाने पड़े। आंख की बनावट को बनाए रखने और देखने की क्षमता के वापस आने की संभावना को अधिकतम करने के लिए खराब हुए टिश्यू का इलाज किया गया। डॉक्टरों ने कहा कि तुरंत इलाज और सर्जिकल रिपेयर के बिना आंख की देखने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो सकती थी, गंभीर संक्रमण हो सकता था, आंखों को गंभीर स्ट्रक्चरल नुकसान हो सकता था और कॉस्मेटिक डीफॉर्मिटी भी हो सकती थी।

इस मामले को लेकर नानावटी मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के कंसल्टेंट – ऑफ्थेल्मोलॉजिस्ट, डॉ. जिमित चौधरी ने कहा, ‘यह बहुत गंभीर चोट थी, जिसमें स्थायी रूप से आंख की रोशनी चले जाने का बहुत ज्यादा खतरा था। ऐसे मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि थोड़ी सी भी देरी से ऐसा नुकसान हो सकता है, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता है। साथ ही इंफेक्शन और आंख के खराब होने का खतरा रहता है। मरीज को सही समय पर अस्पताल ले आया गया था, जिससे हमारी इमरजेंसी और ऑफ्थेल्मोलॉजी टीमों को आसानी से कदम उठाने का मौका मिला। हमारी प्राथमिकता थी आंख को बचाना, नुकसान को रिपेयर करना और आंख की रोशनी बनाए रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ संभव कदम उठाना।’

मैक्स हेल्थकेयर के सीनियर डायरेक्टर एवं वेस्टर्न रीजन के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर - डॉ. विवेक तळावलीकर ने कहा, ‘यह मामला दिखाता है कि कैसे समय पर इलाज, क्लीनिकल विशेषज्ञता और को-ऑर्डिनेटेड टीमवर्क से ऐसे मामलों में बेहतर नतीजे मिल सकते हैं, जहां हर मिनट कीमती होता है। इमरजेंसी कभी योजना बनाकर नहीं आती। लेकिन किसी चोट या शरीर के किसी नाजुक अंग में अचानक आई परेशानी की स्थिति में मरीजों और उनके परिवार के लोगों को यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि उन्हें तुरंत एक्सपर्ट केयर मिल सकती है। नानावटी मैक्स हॉस्पिटल का इमरजेंसी डिपार्टमेंट इसी तरह की गंभीर स्थितियों के लिए है। यहां 24 घंटे कंसल्टेशन केयर, रैपिड ट्रायज, एडवांस्ड बेडसाइड डायग्नोस्टिक सपोर्ट और मल्टीडिसिप्लिनरी स्पेशलिस्ट तक पहुंच मिलती है।’

मरीज की सही रिकवरी हुई है और वह अब रोशनी को देखने और हाथों की मूवमेंट को पहचानने में सक्षम हैं। उनकी आंख की मूवमेंट नॉर्मल है, जो कि रिकवरी की बहुत बड़ी पहचान है। मरीज को फॉलो-अप में रखा जाएगा और आगे भी कुछ प्रोसीजर करने होंगे, जिनमें सेंकेंडरी लेंस इम्प्लांटेशन और रेटिनल ट्रीटमेंट शामिल हैं। यह उनकी रिकवरी और आगे की जांच के हिसाब से तय किया जाएगा।

यह सफल मामला नानावटी मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में इमरजेंसी मेडिसिन, ऑफ्थेल्मोलॉजी, एनेस्थीसिया, सर्जिकल एवं नर्सिंग टीमों के समन्वित प्रयासों को दिखाता है। साथ ही सही समय पर इलाज और दृष्टि बनाए रखने की अधिकतम संभावना भी सुनिश्चित करता है।

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