वीडियो कॉल पर जांच से सर्जरी तक—लकवाग्रस्त मरीज ने फिर से चलना सीखा
मुंबई। जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के डॉक्टरों ने एक बेहद जटिल और जोखिम भरी सर्वाइकल स्पाइन सर्जरी कर एक ऐसे मरीज को नया जीवन दिया है, जो गंभीर दुर्घटना के बाद गर्दन के नीचे पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गया था। इस सफल सर्जरी के बाद मरीज अब दोबारा खड़ा होने और चलने में सक्षम हो गया है।
मरीज राजीव वरवाडे को यह गंभीर चोट उस समय लगी जब वह काम से घर लौटते समय मोटरसाइकिल से गिर गए। इस दुर्घटना में उनकी गर्दन की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया और रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) पर गंभीर दबाव पड़ गया। इसके कारण उनके कंधों के नीचे का पूरा शरीर काम करना बंद कर चुका था। ऐसी चोटों में मृत्यु का खतरा बहुत अधिक होता है और गंभीर न्यूरोलॉजिकल लॉस (जैसा कि फिल्म सुपरमैन के अभिनेता क्रिस्टोफर रीव को हुआ था) होता है। ऐसे में अक्सर मरीज हमेशा के लिए चलने-फिरने की क्षमता खो देते हैं।
परिवार ने क्षेत्र के कई अस्पतालों से संपर्क किया, लेकिन अधिक जोखिम के कारण उन्हें इलाज देने से मना कर दिया गया। डॉक्टरों का कहना था कि यह चोट स्थायी है और सर्जरी से कोई खास फायदा नहीं होगा। इसके अलावा सर्जरी खुद भी बेहद जोखिम भरी थी और ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने की आशंका थी। करीब 15 दिनों तक बिना इलाज के घर पर रहने के दौरान उनकी हालत और खराब होती चली गई। वह हाथ-पैर तक नहीं हिला पा रहे थे और उनके सामने अनिश्चित भविष्य का खतरा मंडरा रहा था, जबकि घर पर उनके छोटे बच्चे भी थे।
जब परिवार इलाज के लिए लगातार विकल्प तलाश रहा था, तब उन्हें डॉ. मनीष कोठारी के बारे में पता चला, जो जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में कंसल्टेंट स्पाइन सर्जन हैं। बीड जिले के कुछ जटिल मरीजों का सफल इलाज करने के उनके अनुभव के बारे में सुनकर परिवार ने उनसे संपर्क किया। डॉ. कोठारी ने सबसे पहले वीडियो कॉल के जरिए श्री राजीव वरवाडे की जांच की। जांच में यह सामने आया कि चोट के नीचे दोनों हाथ पूरी तरह लकवाग्रस्त थे और पैरों में भी कोई हरकत नहीं थी। हालांकि, बाएं पैर के अंगूठे में बहुत हल्की सी हरकत दिखाई दी। इस छोटे से संकेत ने यह उम्मीद जगाई कि स्पाइनल कॉर्ड की चोट पूरी तरह स्थायी नहीं है और इलाज से सुधार संभव हो सकता है।
जब राजीव वरवाडे को जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर लाया गया, तब तक इलाज में हुई देरी के कारण उनकी पहले से गंभीर स्थिति और जटिल हो चुकी थी। सर्जरी में बड़ा जोखिम था, जिसमें ऑपरेशन के दौरान जान का खतरा या लंबे समय तक वेंटिलेटर पर निर्भर रहने की संभावना भी शामिल थी। सभी संभावित जोखिमों और परिणामों पर विस्तार से चर्चा करने के बाद परिवार ने सर्जरी कराने का निर्णय लिया।
सर्जरी टीम ने यह जटिल सर्वाइकल स्पाइन ऑपरेशन इस उद्देश्य से किया कि स्पाइनल कॉर्ड पर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सके और घायल हिस्से को स्थिर किया जा सके। ऑपरेशन के बाद शुरुआती दिनों में ही सुधार के संकेत दिखाई देने लगे। करीब दो हफ्तों के भीतर वरवाडे सहारे से चलने लगे। तीन महीने बाद अब वह बिना सहारे के चल पा रहे हैं और अपने जीवन को फिर से सामान्य बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
डॉ. मनीष कोठारी, कंसल्टेंट स्पाइन सर्जन, जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने कहा, “राजीव के मामले की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह थी कि सर्जरी तकनीकी रूप से सफल होने के बाद भी उनके वेंटिलेटर पर निर्भर रहने की आशंका बहुत अधिक थी। ऑपरेशन थिएटर में लिया गया हर फैसला इसी जोखिम को ध्यान में रखकर किया गया। हमारा उद्देश्य केवल दबाव कम करना नहीं था, बल्कि उन्हें फिर से अपने दम पर सांस लेने और स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का मौका देना था। अब उन्हें बिना वेंटिलेटर के स्वस्थ होते देखना सचमुच बेहद प्रेरणादायक है।”
डॉ. मिलिंद खड़के, डायरेक्टर मेडिकल सर्विसेज, जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने कहा, “राजीव का मामला यह दिखाता है कि बड़े और उन्नत इलाज की सुविधाओं वाले अस्पतालों को कितनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार रहना पड़ता है। जब अधिक जोखिम के कारण अन्य जगहों पर उपचार संभव नहीं हो पाता, तब सही विशेषज्ञता, मजबूत बुनियादी ढांचे और उन्नत क्रिटिकल केयर सुविधा वाले संस्थानों के लिए आगे आना बेहद जरूरी हो जाता है। इस मामले का सफल परिणाम समन्वित और बहु-विषयक चिकित्सा दृष्टिकोण की ताकत को दर्शाता है और यह भी बताता है कि हम जटिल स्पाइन मामलों का इलाज करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”
राजीव वरवाडे ने कहा, “दुर्घटना के बाद मेरी ज़िंदगी अचानक बदल गई। मैं जो पहले पूरी तरह सक्रिय था, अचानक बिस्तर पर पड़ गया और हाथ-पैर तक हिलाने में असमर्थ हो गया। उसके बाद के दिन अनिश्चितता और डर से भरे थे, खासकर जब हमें चोट की गंभीरता के बारे में बताया गया। उस समय जसलोक आना हमारे लिए आखिरी उम्मीद जैसा लगा। इसके बाद का सफर आसान नहीं रहा, लेकिन जब मैंने पहली बार सहारे से खड़े होने की कोशिश की, तो वह पल मेरे और मेरे परिवार के लिए बेहद भावुक था। आज फिर से चल पाने की क्षमता मुझे जीवन का दूसरा मौका मिलने जैसा लगता है।”
यह मामला दिखाता है कि जसलोक अस्पताल जटिल और अधिक जोखिम वाली स्पाइन चोटों की सर्जरी करने में सक्षम है और ऐसे मामलों में भी मरीजों की चलने-फिरने की क्षमता वापस लाने में सफलता हासिल कर सकता है, जहाँ उम्मीद बहुत कम दिखाई देती है।
Post a Comment