मुंबई। बोरीवली के चिकूवाड़ी में आयोजित 64 मुमुक्षुओं के सामूहिक दीक्षा महोत्सव ‘संयमरंग उत्सव’ के तीसरे दिन भक्ति और समर्पण का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस ऐतिहासिक अवसर पर दीक्षार्थियों के संयम जीवन के प्रतीक ‘संयम कवच’ (वेश) एवं आवश्यक उपकरण अर्पित करने के लिए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। विभिन्न उछालों के माध्यम से कुल राशि करोड़ों रुपये तक पहुँच गई।
संयम वेश एवं नामकरण की उछाल
जैन परंपरा के अनुसार, जब कोई आत्मा संयम का मार्ग स्वीकार करती है, तब दीक्षा वस्त्र और पाँच आवश्यक उपकरण अर्पित करने का विशेष महत्व होता है। इस पावन अवसर पर 64 दीक्षार्थियों के लिए 330 से अधिक बोलियाँ लगीं। उपकरण अर्पण के साथ-साथ दीक्षा पश्चात साधु-साध्वी के नए नाम घोषित करने का सौभाग्य पाने के लिए भी श्रद्धालुओं में तीव्र प्रतिस्पर्धा देखी गई। उल्लेखनीय है कि ये 64 दीक्षार्थी 17 विभिन्न समाजों से आते हैं, जिनके परिवारों ने अपनी संपत्ति को धर्म मार्ग में समर्पित करने की घोषणा की।
भक्तिमय कार्यक्रम एवं भावुक विदाई
तीसरे दिन दोपहर को भव्य ‘अष्टप्रकारी पूजा’ का आयोजन हुआ। अहमदाबाद के प्रसिद्ध संगीतकार शनि शाह और वडोदरा के शिवम सिंह की सुर-ताल पर हजारों श्रद्धालु भक्ति में लीन हो गए। रात्रि सत्रों में भावुक दृश्य देखने को मिले। दूसरी रात 27 दीक्षार्थियों ने अपने जीवन और वैराग्य की कथा सुनाई, जबकि तीसरे दिन शेष 28 दीक्षार्थियों की मार्मिक दास्तान ने उपस्थित जनसमूह की आँखें नम कर दीं।
वर्सीदान एवं भव्य शाही शोभायात्रा (7 फरवरी)
7 फरवरी को 64 दीक्षार्थियों की भव्य शाही शोभायात्रा धूमधाम से निकाली जाएगी। लगभग 10,000 लोगों की उपस्थिति और 200 कार्यकर्ताओं की योजना के साथ यह 6 किमी लंबी यात्रा मालाड (पूर्व) से बोरीवली (चिकूवाड़ी) तक जाएगी। इस दौरान दीक्षार्थी अपनी भौतिक संपत्ति का ‘वर्सीदान’ करेंगे, जो समाज को यह संदेश देता है कि सच्चा सुख संपत्ति में नहीं, त्याग में है। इस संपूर्ण शोभायात्रा का लाभ मातृश्री प्रभाबेन नटवरलाल दोशी (वाला – बनासकांठा) परिवार ने लिया है।
विजय-तिलक एवं अंतिम प्रतिभोजन
शोभायात्रा के समापन के बाद दीक्षार्थियों को दीक्षा से पूर्व ‘विदाई-तिलक’ किया जाएगा। जैन परंपरा में इसे युद्ध के लिए निकलने वाले सेनापति को किए जाने वाले ‘विजय-तिलक’ के समान गौरवशाली माना जाता है, क्योंकि ये मुमुक्षु आंतरिक विकारों के विरुद्ध युद्ध के लिए अग्रसर हो रहे हैं। इस विधि के लिए भी उछाल बोली जाएगी।
इसके पश्चात 7 तारीख की संध्या को दीक्षार्थी संसार का ‘अंतिम प्रतिभोजन’ करेंगे। यह उनका थाली-बर्तन में लिया गया अंतिम भोजन होगा, क्योंकि दीक्षा के बाद वे आजीवन काष्ठ पात्र में ही गोचरी ग्रहण करेंगे। रात्रि में कम आयु में दीक्षा लेने वाले 9 मुमुक्षु अपने वैराग्य के पीछे की गहन समझ और प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत करेंगे।
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