आज मैं जिस क़िताब की चर्चा करने जा रहा हूँ. वह ग़ज़लों की क़िताब है. जिसका उन्वान है ‘अपने हिस्से का ख्वाब’ इसे प्रकाशित किया है प्रलेक प्रकाशन ने. ११४ पृष्ठों की इस किताब का मूल्य २००/- रूपये है.
इस किताब की मुझ तक आने की भी एक कहानी है. हुआ यूँ कि मैं कवि सम्मेलन के सिलसिले में बिहार के लखीसराय जा रहा था. मुंबई से पटना की रेल थी. पटना एक दिन रुकना हुआ. वहीं पर एक गोष्ठी में इसके लेखक अविनाश बन्धु आये! मुझे देखते ही साष्टांग प्रणाम किये (किया), एक पीताम्बर से मेरा सम्मान करते हुए यह कृति भेंट की. मैं कुछ क्षणों के लिए हतप्रभ था. क्योंकि मैं इससे पहले कभी बन्धु जी से मिला नहीं था. मेरे प्रति उनका यह सम्मान अंदर तक मुझे भिगो गया. यह बात ८ सितम्बर २०२५ की है. तब से पारिवारिक और साहित्यिक व्यस्तता के कारण इस पर अपने भाव व्यक्त नहीं कर सका. जितने सरल अविनाश बन्धु जी हैं. उतनी ही सरल उनकी शायरी भी है. बन्धु जी की ग़ज़लों की भाषा बेहद सरल किन्तु अर्थ बोध में बड़ी सरस है. राष्ट्र और समाज दोनों परिदृश्य इनकी ग़ज़लों में सामान रूप से उपस्थित हैं. उदाहरण के रूप में देखें तो-
फौलादी सीनों में जलते प्रेम की अगन ज़रूरी है!!
कुछ भी हो जाए मेरे यारों पहले वतन जरुरी है!!
उपर्युक्त शेर जहाँ राष्ट्र प्रेम की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ ज़िंदगी से भी रूबरू करता है.
उदाहरण देखें-
पूरी तरह खड़ा हूँ मैं इस ज़िन्दगी के साथ!!
कीजे क़बूल मुझको मेरी बेबसी के साथ!!
सहरा में घर बना के कहाँ चैन से हूँ मैं!!
करने लगी मजाक़ हवा रौशनी के साथ!!
ग़ज़ल के इन शेरों में ज़िन्दगी की सच्चाई नज़र आती है. बन्धु जी ने बड़ी बेबाक़ी और सहजता से बड़ी बात को चार मिसरों में उतार दिया है. इक्कीसवीं सदी में सामाजिक ढांचे में जब तेजी से बदलाव हो रहा है.
तब बन्धु लिखते हैं-
मैं तो एक किसान रहा हूँ!!
मौसम का संताप सहा हूँ!!
घर में चहल फल रहने दो!!
चुप रह कर मैं रोज ढहा हूँ!!
अविनाश बन्धु जी की यह पहली कृति है. सो धीरे धीरे और निखार आएगा. इनकी ग़ज़लें सम्भावना तो जताती हैं.
इस संग्रह के कुछ मेरे पसंद के शेर :-
दवा दो या करो हक़ में दुआएं !!
वो मेरे ख्वाब को भी रौंदता है !!
ईमान इस जहान में पैसा है आज कल!!
अच्छाई तो फ़रेब है धोखा है आजकल !!
जुबां पर लफ्ज़ पहले तोलता है!!
वो हमसे जब कभी कुछ बोलता है!!
इस इश्क की दुकां के तलबगार तुम भी हो!!
हम ही नहीं है सिर्फ़ ख़रीदार तुम भी हो!!
वैसे तो दिल में मेरे वो हमेशा रहता है!!
और बाहर वो कहाँ रहता है पता ही नही!!
अविनाश बन्धु जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी है. यह गायन और अभिनय के क्षेत्र में भी सक्रिय है. सरल और मृदुभाषी अविनाश जी को मेरी अनेक शुभकामनाएं.
- पवन तिवारी, मुम्बई (कवि एवं उपन्यासकार)
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