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अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच का ऑनलाइन कवि सम्मेलन बहुत ही अदभुत रहा। जिसमें कुल मिलाकर 95 प्रतिभागी सम्मिलित हुए, यदि अतिथिगण को भी जोड़ लिया जाए तो 100 से ज्यादा थे।
इस वजह से इस कार्यक्रम को दो सत्रों में रखा गया। सम्मेलन का 45 वाँ दिवस था औऱ विषय तीन निर्धारित किए गए थे:- लोरी, शहरी करण पर प्रहार तथा पत्नि का पति पर प्रहार-हास्य रस, पर आयोजित किया गया।
 मंच की अध्यक्ष अलका पाण्डेय ने बताया की लाकडाऊन और कोरोना जैसी महामारी के दौर में यह जरुरी था कि हमारी सोच को हम सकारात्मक रखे व समय का सदुपयोग करें, एक रचनाकार को लिखने से अच्छा और काव्यपाठ से अच्छा और भला क्या ? बस इसलिये विभिन्न विषयों पर रोज़ काव्य सम्मेलन किया जा रहा है। अब जब लाकडाऊन कुछ कुछ ढीला हो रहा है तो हर रविवार 4 से 7 बजे तक कर दिया है और घर रहकर देश विदेश में बैठे साहित्यकारों को एक मंच पर लाना हिंदी साहित्य का प्रचार प्रसार नित्य नया सृजन और नव साहित्यकारों को मार्गदर्शन देना
तथा कोरोना योद्धा को सम्मान व उनकी निष्ठा व सहयोग का अभिनंदन करना जरूरी है।
एक दूसरे से सब इतना घुल मिल गये हैं कि लगता ही नहीं हम लोग मिले नही बिना मिले ही एक प्यार भरा रिश्ता बन गया है। पूरे देश विदेश में हम लोगों के अपने जानने वाले रिश्ते क़ायम हो गये, यह हम सभी के लिऐ बहुत बड़ी उपलब्धि है।
अग्निशिखा के संग काव्य के विविध रंग में हर बार नया विषय होता है। रविवार 7 जून के कवि सम्मेलन प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि सेवा सदन प्रसाद (वरिष्ठ लघु कथाकार), निर्णायक डा. अंरविद श्रीवास्तव असीम,
मंच संचालन डॉ अलका पाण्डेय, डॉ प्रतिभा कुमारी पराशर, चंदेल साहिब थे।
माँ शारदे की वंदना की पदमा तिवारी ने तथा आभार मधु वैष्णव ने किया।
सभी ने सरस्वती वंदना के बाद कोरोना योद्धाओं का सलामी दी व कार्यक्रम को शुरु किया।
दूसरे सत्र के मुख्य अतिथि डॉ सुशीला ( लेखिका), निर्णायक डॉ रामस्वरुप साहू (वरिष्ठ साहित्यकार),
मंच संचालक श्रीमती शोभा रानी तिवारी, जनार्दन शर्मा, रिशू पाण्डेय, अलका पाण्डेय, चंदेल साहिब ने किया।
अध्यक्ष अलका पांडेय ने लिखा कि "प्रकृति का करने लगे विनाश, धरा के लिये बना है अभिशाप !!
ख़त्म कर रहे है देखो हरियाली, धधक रही है सूरज की प्याली !!
चंदेल साहिब कहते हैं - 'मुझे नहीं भाता ये दुनिया का संगीत, प्यारी सी मीठी सी लोरी चाहता हूँ, माँ के आँचल में सोना चाहता हूँ।
रानी नारंग कहती हैं - शहरों की बढ़ती आबादी जगह नहीं है रहने को, सीमेंट की इमारतें यहां और सड़कें कंक्रीट की..
शकुंतला कहती हैं - धरा हमारी अनुपम, अद्भुत सुंदर बहुत है इसका रूप,
डॉ.पुष्पा गुप्ता लिखती हैं - चंदा लोरियां सुनाए, हवा झुलना झुलाए, रानी निंदिया सुलाए मेरे लाल को, 
शेखर तिवारी कहते है - कोई अगर बेरुखी से भरा हो तो, उसके आगे आंसू बहाने की, जरूरत क्या है।
रागनी मित्तल - चांद होता है जिससे रोशन वो चांदनी हूं।
आग दरिया में लगा दे, मै वो दामिनी हूं। सुना है आपके दिल में भी बजती सरगम,
डॉ. दविंदर कौर का कहना है :- मां की चुनर में महक ममता की होती है
मां की लोरियों में बेटी परी ही होती है |
पद्माक्षी शुक्ल कहती हैं कि ये सप्तरथक की आये सवारी, रंगो से भर दे, बादल की क्यारी,
किरणों से छाये धरती सारी, मुझे लगती भोर प्यारी।
संजय कुमार मालवी कहते है - आज प्यासे अधरों पर बारिश की पहली बून्द पड़ी है।
मंजुला अस्थाना महंती का कहना है "शहरीकरण
ऊँची ऊँची इमारतें बड़े बड़े मकान बेहद खूबसूरत औ बड़े आलीशान ऐसा भी वक्त आयेगा क्या था ज्ञान किसी को पत्थर के नगरों में बसेंगे पत्थर के इंसान।
सिद्धार्थ तलवारे - बड़ी ही खूबसूरत शाम थी, वो तेरे साथ की।
अब तक खुशबू नही गई, मेरी कलाई से तेरे हाथ की...
सुरेन्द्र हरडे कहते है - फुलों सा मन, च़ंदन सा तन, काया है कंचन।
डा. महतब आज़ाद का कहना है - जब से रहा न साथ तेरा जिंदगी के साथ!
दिल का सुकूँ भी खो गया लब की हंसी के साथ।
डॉ मीना कुमारी परिहार कहती है - चांदनी रे झूम अंखियों में छोटे-छोटे सपने सजाके, बहिनों में झूले मेरी बिटिया रानी।
सबने बहुत सुंदर रचना प्रस्तुत की।
 सात घंटे तक चली इस कार्यक्रम के प्रतिभागी थे - अंकिता सिन्हा, सुनीता चौहान, मंजुला वर्मा, द्रोपती साहू, डॉ गुरिंदर गिल, सीमा दुबे सांझ, सुषमा शुक्ला, सुनीता अग्रवाल, पुष्पा गुप्ता, मंजुला अस्थाना, मदन मोहन शर्मा, शुभा शुक्ला, संजय कुमार मालवी, अख़्तर अली शाह, पदमा ओजेंद्र तिवारी, प्रतिभा द्विवेदी मुस्कान, रागिनी मित्तल, सुरेंद्र कुमार उपाध्याय, मीना कुमारी परिहार, दीपा परिहार, इंद्राणी साहू, ओमप्रकाश पांडेय, डॉ रश्मि शुक्ला, कल्पना भदौरिया, डॉ नेहा इलाहाबादी, मुन्नी गर्ग, गोवर्धन लाल बघेल, मीना कुमारी परिहार, स्मिता धिरासरिया, मीना गोपाल त्रिपाठी,
वंदना, रमेश चंद्र शर्मा, देवा, मनीषा व्यास, डॉ लीला दीवान, डॉ अंजुल कंसल, कनुप्रिया, सुषमा शुक्ला, शेखर राम कृष्ण, सुनीता अग्रवाल, उपेंद्र अजनबी, डा. महताब आजाद, हीरा सिंह कौशल, डॉ धाराबल्लभ पांडेय, पद्माक्षी शुक्ल, गजेंद्र कुमार घोघरे, सेवा सदन प्रसाद, अरविंद श्रीवास्तव, चंदेल साहिब, प्रतिभा कुमारी पराशर, विष्णु असावा, ज्योति भाष्कर, संजय कुमार मिश्र, डॉ उषा पांडेय, समुंदर सिंह, आचार्य सूर्य प्रसाद, अर्चना पाठक, दिनेश शर्मा, अनिता शरद झा, अलका जैन, कमल कालू दहिया, ज्ञानेश कुमार मिश्रा, रामेश्वर प्रसाद, चन्द्रिका व्यास, सुशीला कुमारी, गणेश रामदास निकम,
गरिमा, शोभा रानी तिवारी, आनंद जैन अकेला, मीरा भार्गव, सुदर्शना, छगनराज राव, कल्पना भदौरिया, स्वप्निल, कांता अग्रवाल, आशा जाकड़, सावित्री तिवारी, रविशंकर कोलते, विजया बाली, रजनी अग्रवाल, उध्दव समिन्द्रे, सुरेंद्र हरडे, गीता पांडेय बेबी, प्रिया उदयन, वैष्णो खत्री, ज्योति जलज, रेखा पांडे रीत, डॉ नीता श्रीवास्तव, डॉ साधना तोमर, शरद अजमेरा, सुरेंद्र कुमार जोशी,डॉ संगीता पाल, मधु वैष्णव मान्या, जनार्दन शर्मा आशू, रिशू पाण्डेय, डॉ सुशिला पाल, डॉ रामस्वरुप साहू ने एक दूसरे को सुना।
अभी तक 4000 से ज्यादा कवियों ने कविता पाठ कर एक किर्तीमान स्थापित किया है।

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