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वर्तमान समय में अलग अलग कंटेंट की मूवी दर्शकों के सामने आ रही है। क्राइम थ्रिलर सब्जेक्ट पर बनी फ़िल्म 'वन डे' जिसमें अनुपम खेर, ईशा गुप्ता और कुमुद मिश्रा ने अभिनय किया है। जो कि ज्यूडिशियल सिस्टम पर बनी है। इस फ़िल्म के निर्देशक अशोक नंदा है जो इससे पहले इंग्लिश मूवी 'फायर डस्टर', हिंदी फ़िल्म 'हम तुम और मॉम' और 'रिवाज' बना चुके हैं। अशोक कुमार नंदा से फ़िल्म के बारे में और भारतीय संविधान के न्याय प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर बेबाक होकर बातचीत के कुछ अंश - - इस फ़िल्म का कॉन्सेप्ट आपके दिमाग में कैसे आया ? अशोक - हमारे राइटर ने यह कहानी सुनाई जो मुझे अच्छी लगी क्योंकि यह फ़िल्म अन्य कहानियों से अलग है। यह फ़िल्म ज्यूडिशियल सिस्टम पर केंद्रित है। इसमें हमारी न्याय प्रणाली की व्यवस्था को दर्शाया गया है। - फ़िल्म में अनुपम खेर को लेने की कुछ खास वजह उनका फ़िल्म में क्या रोल है ? - अनुपम की फिल्म सारांश और उनके विभिन्न चरित्र रोल से मैं प्रभावित हूँ। इसलिए इस रोल के लिए मेरी पहली पसंद अनुपम खेर ही थे। इसके अलावा रिटायर्ड जज के लिए जिस उम्र के व्यक्ति की जरूरत थी उस लिहाज से भी अनुपम सही थे। मैंने अनुपम को कहानी सुनाई और उन्हें भी कहानी पसंद आई। फ़िल्म में अनुपम एक रिटायर्ड जज के रोल में हैं जो फ़िल्म का महत्वपूर्ण किरदार है। - फ़िल्म की कहानी में एक औरत जज को थप्पड़ लगती है इस सीन के दौरान आपको किसी दिक्कत का सामना करना पड़ा ? - इस फ़िल्म की शूटिंग झारखंड के हाइकोर्ट में हुई है और एक औरत हाई कोर्ट में जज को थप्पड़ मारती है, इस सीन की शूटिंग हमें दूसरी जगह करनी पड़ी क्योंकि वास्तविक हाइकोर्ट में जज को मारने वाला फिल्मांकन उचित नहीं था। इसपर विरोध न हो इसलिए हमें अलग जगह फ़िल्म शूट किया। - जज को हाइकोर्ट में थप्पड़ मारना क्या यह सीन के माध्यम से कोई कॉन्ट्रोवर्सी क्रीएट करना चाहते हैं ? - फ़िल्म के इस सीन की सच्चाई फ़िल्म में दिखाई गई है। यह फ़िल्म का मुख्य हिस्सा है। एक औरत अपने बेटे के मरने के बाद इन्साफ न मिलने की वजह से यह हरकत करती है। उसे लगता है कि जज बिक गया है इसलिए उसने गुनहगार को छोड़ दिया। जज भी थप्पड़ खाकर बेचैन हो जाता है और आत्ममंथन करता है कि शायद उससे कोई गलती हुई है। - इस फिल्म की काफी चर्चा है इस फ़िल्म की यु एस पी क्या है ? - फिल्म का यु एस पी यह है कि केवल अमीर और प्रसिद्ध व्यक्ति को ही न्याय क्यों मिलता है एक मध्यम वर्गीय और साधारण व्यक्तियों को भी न्याय पाने का अधिकार है। साथ ही फ़िल्म में अनुपम खेर का बेहतरीन अभिनय देखने को मिलेगा। सारांश और कर्मा फिल्म से भी बेहतर किरदार निभाते अनुपम खेर दिखाई देंगे। - ईशा गुप्ता हमेशा ग्लैमरस रोल में दिखती है पर इस फ़िल्म में वह अलग नजर आ रही है इस फ़िल्म में उनका किरदार कैसा है ? - ईशा गुप्ता का फ़िल्म में महत्वपूर्ण रोल है। वह फ़िल्म की हिरोइन है। इस फ़िल्म में अपने ग्लैमरस छवि से अलग एक पुलिस की भूमिका में है। इस फ़िल्म में ईशा ने बेहतरीन संजीदा अभिनय किया है जो दर्शकों के लिए नया अनुभव होगा। इस किरदार को लोग याद रखेंगे। - फ़िल्म के स्टारकास्ट भी बहुत चुनिंदा है इन अभिनेताओं को फ़िल्म में लेने की खास वजह ? - इस फ़िल्म में ज़रीना वहाब, कुमुद मिश्रा, राजेश शर्मा, ज़ाकिर हुसैन जैसे कलाकार हैं। मैं चाहता था कि सारे कलाकार जाने पहचाने हो भले वे कम सीन में दिखाई दें पर उनका किरदार और अभिनय दर्शकों को पसंद आये। - फ़िल्म के संगीत का फिल्म में क्या योगदान रहा है ? - फ़िल्म में गाने कमर्शियल वैल्यू को ध्यान में रखकर गाने बनाया गया है। फ़िल्म में बैक ग्राउंड म्यूजिक है जिसमें अपहरण होता है। एक टाइटल सांग में ईशा की इंट्री होता है साथ ही शादी का सांग है जिसमें कहानी आगे बढ़ती है। - आजकल के युवाओं को कंटेंट बेस कहानी, हॉरर कॉमेडी, रोमांस पसंद आता है। लोग ड्रामा फिल्में कम देखते हैं। आपकी फ़िल्म से दर्शक क्या अपेक्षा रखेंगे ? - आज का यूथ समझदार है, वह फ़िल्म की कहानी और गहराई देखता है। हमारी फ़िल्म ज्यूडिसल जस्टिश पर आधारित थ्रिलर कहानी है जो युथ के साथ सभी वर्ग के लोगों को पसंद आएगी। -आपकी फ़िल्म 14 जून को आ रही थी फिर डेट आगे करने की क्या वजह रही ? - सेंसर बोर्ड के कारण फ़िल्म की डेट को आगे बढ़ानी पड़ी। फ़िल्म के एक सीन में झारखंड हाइकोर्ट दिख रहा है, जिसके लिए सेंसर ने सीन हटाने या फिर एन ओ सी लाने को कहा। हमारी फ़िल्म की कहानी झारखंड बेस्ड है हम नहीं चाहते थे कि सीन हटे इसलिए एन ओ सी के कारण लेट हो गया। - आप फ़िल्म के माध्यम से क्या मैसेज देना चाहते हैं ? हमारी न्याय प्रणाली के बारे में आपके क्या विचार है क्या इसमें परिवर्तन लाना चाहिए ? - हमारी फ़िल्म 'वन डे' का स्लोगन ही है 'जस्टिश डिले टू जस्टिश डिनाय' , हम सीधे तौर पर कुछ नही कर सकते पर आज का युवा समझदार और जागरूक है वह परिवर्तन ला सकता है। मैं फ़िल्मकर हूँ और अपनी फिल्म के माध्यम से दर्शकों तक अपना मैसेज पहुँचाना चाहता हूँ कि न्याय पाना हर वर्ग का अधिकार है। हमारी फ़िल्म में भी कई संवाद है जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देंगे।

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