मुंबई। द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के वार्षिक प्रमुख मंच, वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट (डब्लूएसडीएस) 2026 के रजत जयंती संस्करण का शुभारंभ भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री, भूपेंद्र यादव द्वारा किया गया। अपने मुख्य संबोधन में, मंत्री ने समानता, लचीलापन और सतत विकास पर टिकी जलवायु महत्वाकांक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया।
यह आयोजन जलवायु और विकास से जुड़े परिवर्तनकारी कार्यों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दुनिया भर के नेताओं, नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के दिग्गजों, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को एक साथ लाता है। इस अवसर पर टेराज़ोन में 'हिम-कनेक्ट' और डब्लूएसडीएस आर्काइवल पॉकेटबुक का विमोचन हुआ।
“परिवर्तन | ट्रांसफॉर्मेशन्स: सतत विकास के लिए दृष्टि, स्वर और मूल्य” की व्यापक थीम के अंतर्गत आयोजित डब्लूएसडीएस का यह 25वां संस्करण, शिखर सम्मेलन की विरासत में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह 'ग्लोबल साउथ' (वैश्विक दक्षिण) में आधारित सतत विकास पर स्वतंत्र रूप से आयोजित होने वाला दुनिया का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय मंच है।
स्वागत संबोधन देते हुए टेरी के अध्यक्ष, नितिन देसाई ने कहा, “आज दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। हमारे सामने चुनौती जागरूकता की नहीं, बल्कि कार्रवाई की है। वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट का पूरा सफर सिर्फ जागरूकता की बातें करने से हटकर अब इस बात की बेहतर समझ की ओर बढ़ा है कि स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए वास्तव में क्या किया जाना चाहिए। हमारे सामने सबसे गंभीर समस्या जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की है।”
टेरी की महानिदेशक, डॉ. विभा धवन ने अपने थीम संबोधन में इस बात पर जोर दिया, “पिछले 25 संस्करणों के दौरान, डब्लूएसडीएस वैश्विक दक्षिण के लिए जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर विमर्श को दिशा देने वाला एकमात्र स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय मंच बन गया है। हम चर्चाएं तो बहुत कर चुके हैं, लेकिन आज हमें भारत और वैश्विक, दोनों स्तरों पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है।”
सत्र के समापन से पहले, डॉ. धवन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साझा किया गया एक विशेष संदेश पढ़कर सुनाया। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा, “हमारा दृष्टिकोण 'अंत्योदय' से प्रेरित है, जिसका अर्थ है सबसे वंचित व्यक्ति का उत्थान। जलवायु कार्रवाई को सबसे पहले कमजोर, गरीब और वंचित वर्ग की रक्षा करनी चाहिए। ग्लोबल साउथ जलवायु परिवर्तन का असमान रूप से बहुत अधिक भार वहन करता है, फिर भी उनके लिए विकास अनिवार्य है। इसलिए 'जलवायु न्याय' अत्यंत आवश्यक है। विकासशील देशों को पृथ्वी की रक्षा करते हुए गरीबी और भूख का उन्मूलन करना होगा, जिसके लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, वित्तीय विकल्प और साझेदारियां बहुत जरूरी हैं।
विकसित देशों की यह विशेष जिम्मेदारी है कि वे तेजी से आगे बढ़ें, सतत जीवनशैली अपनाएं और बड़े पैमाने पर वित्त व तकनीक उपलब्ध कराएं। मुझे उम्मीद है कि यह सम्मेलन संकल्पों को मजबूत करेगा, सहयोग को गहरा करेगा और हमारे ग्रह के लिए एक सतत भविष्य सुनिश्चित करेगा। WSDS के रजत जयंती संस्करण में सार्थक विचार-विमर्श के लिए मेरी ढेरों शुभकामनाएं।”
विशेष संबोधन में, टाटा ट्रस्ट्स के सीईओ, सिद्धार्थ शर्मा ने जोर देते हुए कहा, “यह कार्रवाई का समय है। यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हम जलवायु परिवर्तन की भाषा का लोकतंत्रीकरण करें। इसे केवल सम्मेलनों, बैठक कक्षों या बोर्डरूम की चर्चाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे आम जनमानस तक पहुँचना होगा। लोगों को यह समझना होगा कि यह उन पर कैसे प्रभाव डालता है। इसके बाद हमें ऐसे समाधानों पर काम करना होगा जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हों, और जिनमें अनुकूलन को भी उतना ही महत्व दिया जाए जितना हम शमन को देते हैं।”
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