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- संविधान के विपरीत संयुक्त सचिव और जिला प्रतिनिधि ने रखा है पीएस

पटना। बिहार क्रिकेट संघ ने तरक्की के कुछेक मामलों में बीसीसीआई को भी पीछे छोड़ दिया है। जिसमें बीसीए के पैसे पर सीओएम सदस्यों को निजी सचिव रखने की आजादी शामिल है। चौंकाने वाली बात यह है कि सदस्यों को निजी सचिव रखने की इजाजत ने तो इसका संविधान देता है और न तो सीओएम अथवा एजीएम ने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित किया है फिर भी बीसीए में निजी सचिव रखने की न सिर्फ होड़ लगी है बल्कि उन्हें लाखों रूपया भुगतान करने की भी तैयारी निर्णायक दौर में है।
यह बिहार क्रिकेट संघ की विडंबना माने, सीओएम की अज्ञानता या जानबूझकर की जा रही मनमानी कि संविधान के दिशा निर्देशों के विपरीत काम कर विवादों को हवा दिया जा रहा है। पहले लोकपाल की नियुक्ति और भुगतान का मामला  सुर्खियों में रहा था अब निजी सचिव के रखने और भुगतान को लेकर माथापच्ची जारी है।
सूत्रों की माने तो फिलहाल बीसीए में संयुक्त सचिव कुमार अरविंद और जिला प्रतिनिधि संजय सिंह ने निजी सचिव रखा है जिसके वेतन मद में बीसीए की ओर से लाखों रूपया लुटाने की तैयारी चल रही है।सूत्रों की माने तो दोनों पीएस को क्रमशः 50 और 30 हजार प्रति माह भुगतान मिलना है। जबकि जानकारी के अनुसार बीसीसीआई के सीओएम सदस्यों को निजी सचिव रखने की सुविधा नहीं है। फिर किन शर्तो पर बीसीए में निजी सचिव रखने की होड़ है यह समझ से परे है। हैरानगी इस बात से भी है कि बीसीए के अति महत्वपूर्ण पदों यानी अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष के द्वारा निजी सचिव नहीं लिया गया है। इसके विपरीत संयुक्त सचिव कुमार अरविंद ने आनन फानन में अपने जिला क्रिकेट संघ के सचिव मनोज सिंह को निजी सचिव बनाया है। वहीं जिला प्रतिनिधि संजय सिंह ने भी निजी सचिव (संजीव कुमार) रखने का दावा कर रखा है। हालांकि उसका काम अथवा पहचान अब भी जिलों में होना शेष है।
इस संबंध में पुछे जाने पर पूर्व जिला प्रतिनिधि प्रवीण कुमार ने कहा कि जिला प्रतिनिधि ही नहीं बीसीए के किसी भी सदस्य को निजी सचिव रखने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। पहले की कमिटी में सीओएम सदस्यों ने बगैर निजी सचिव के काम करके दिखाया भी है। उन्होने कहा कि जिला प्रतिनिधि का नैतिक दायित्व जिला संघो की समस्या से सीओएम को अवगत कराना है न कि पैसा बांटना।
सूत्र यह भी बताते हैं कि कैग के सदस्य ने भी सीओएम सदस्यों के निजी सचिव रखने और भुगतान पर ऐतराज़ जता रखा है। बावजूद इसके अध्यक्ष स्तर पर निजी सचिवों को भुगतान की अनुमति कहीं बीसीए को विवादों के भंवर में ले जाने अथवा सीओएम सदस्यों को फांसने की सोंची समझी रणनीति तो नहीं है ?

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