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 सुविख्यात  निर्देशक - लेखक लेख टंडन ( प्रोफेसर ,आम्रपाली , झुक गया आसमान , जहां प्यार मिले,  प्रिंस , आंदोलन , दुल्हन वही जो पिया मन भावे , एक बार कहो , शारदा, अगर तुम ना होते, खुदा कसम , दूसरी दुल्हन , मिल गई मंजिल मुझे ,  इत्यादि फिल्मों से प्रशंसित ) ने एक महत्वपूर्ण विषय की गम्भीरता को भांपकर  निराली फिल्म बनाने की योजना को कार्यान्वित किया ।  फलस्वरूप एक अनोखी फ़िल्म  "फिर उसी मोड़ पर "  का निर्माण कार्य केवल 6 महीनों के अंतराल मे लेख टंडन के  बेजोड़ निर्देशन में सम्पन्न हुआ ।  तदुपरांत इस महान निर्देशक - लेखक का 15 अक्टूबर 2017 को स्वर्गारोहण हो गया । परंतु देहावसान के पूर्व लेख टंडन " फिर उसी मोड़ पर"  जैसी महत्वपूर्ण सम्पादित कर पाये ।  अब इस फिल्म को उनके सहयोगी निर्माता त्रिनेत्र / कनिका / अंशुला बाजपेई अपनी संस्था कनिका मल्टीस्कोप प्राइवेट लिमिटेड के (एम पी एल) के अंतर्गत हजारों प्रशंसकों के समक्ष शीघ्र प्रस्तुत करने वाले हैं । 
 इससे पहले लेखजी ने बिना समय गंवाये अपने चिरपरिचित और विश्वासपात्र अभिनेताओं / अभिनेत्रियों का चयन किया और महत्वपूर्ण किरदार कँवलजीत सिंह , परमीत सेठी , एस.एम. जहीर ,  गोविंद नामदेव , स्मिता जयकर , कनिका बाजपेई ,  राजीव वर्मा , भरत कपूर ,  अरुण बाली , हैदर अली , विनीता मलिक , संजय बत्रा , दिव्या दिवेदी और नवोदिता नायिका जिविधा आस्था , शिखा इटकान ने जीवित किये । इसके अतिरिक्त लेखजी से वर्षो से जुड़े  सहयोगियों जैसे जहांगीर चौधरी ( छायांकन ) , माधव क्रिशन / जोजो ( निर्त्य निर्देशन ) ,  अवध नरायण सिंह ( सम्पादन ) , अमीन सयानी , अली पीटर जॉन ( प्रचारक ) ,  सुरेश प्रेमवती बिश्नोई ( सह - लेखन / सह - निर्देशन ) ,  चोक्कस भरद्वाज ( कला निर्देशन ) इत्यादि ने सकुशल कार्यान्व्यन से फिल्म में चार चाँद लग गए हैं । फिल्म की कहानी एक सीधी - सीधी और मज़लूम महिला नाज़ पर केंद्रित है जिसे उसका बचपन का साथी , शाहिद , धोखे से निकाह करने के बाद तलाक़ दे देता है ।  चार महीने की गर्भवती नाज़ को एक नेक इंसान रशीद सहारा देता है और उसके बच्चे को अपना नाम देकर निकाह कर लेता है ।  इसके बाद रशीद का कैंसर से इंतकाल हो जाता है और हजारों कठिनाइयों के बावजूद नाज़ अपने बेटे ( रशीद जूनियर ) को पालती और  पढ़ाती है । रशीद जूनियर को दुबई मे अच्छी नौकरी मिलती है जहां वो अपनी विदेशी सेक्रेटरी के प्रेम जाल में फंस जाता है और शबनम को तलाक़ दे देता है ।  नाज़ अब " फिर उसी मोड़ पर " है और अपने बेटे की नाइंसाफी और तीन तलाक़ की कुरीति से जंग छेड़ देती है । लेख टंडन की फिल्मों का एक अत्यंत सशक्त पहलू उनका संगीत रहा है ।

- संतोष साहू

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