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मरने के बाद अगर कोई आदमी जागा रहे, तो पहले तो बहुत देर तक उसे पता ही नहीं चलेगा कि मै मर गया हूं। उसे तो पता ही तब चलेगा जब उसकी लाश लोग उठाने लगेंगे और उसको मरघट पर जलाने लगेंगे, तब उसे पक्का पता चलेगा कि मैं मर गया हूं। क्योंकि भीतर तो कुछ मरता ही नहीं, सिर्फ एक फासला हो जाता है। लेकिन फासले का जिंदगी में कभी अनुभव नहीं किया। वह अनुभव इतना नया है कि उसको समझने की कोई पुरानी परिभाषा नहीं है उसके पास। तो उसे सिर्फ इतना ही लगता है कि कुछ अलग-अलग हो गया है। लेकिन कुछ मर गया है, यह उसकी समझ में तभी आता है, जब चरों तरफ लोग रोने-चिल्लाने लगते हैं और उसकी लाश के आस-पास गिरने लगते हैं और उसको उठाकर ले जाने लगते हैं। लाश को जल्दी से मरघट पहुंचा देने का कारण है। लाश को जितनी जल्दी हो सके दफना देने का, आग लगा देने का कारण है। उतनी ही जल्दी उस आत्मा को पक्का पता चल जाए कि शरीर गया, जल गया। लेकिन अगर आदमी मूर्छित है, तो यह भी उसे पता नहीं चल पाता है। यह भी होश में जाए तो ही पता चल पाता है। मरघट पर और लोग ही तुम्हें पहुंचाने न जाएं, तुम भी वहां मौजूद रहना। अपने शरीर को ठीक से जलते हुए देख लेना, ताकि अगली बार यह शरीर का मोह पकड़े न। क्योंकि जो जलता हुआ देख लिया गया हो, उसका मोह विलीन हो जाता है।

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